लेखिका : नेहा गुप्ता, शिक्षिका, दिल्ली
मित्रों, इन दिनों बहुत सी परीक्षाओं का आयोजन किया जा रहा है, जिनमें विशेष रूप से बोर्ड की परीक्षाएं और विभिन्न विश्वविद्यालयों के द्वारा ली जाने वाली परीक्षाएं शामिल है और जब-जब परीक्षाओं पर चर्चा होती है, तो अक्सर चर्चा का केंद्र बिंदु, अंक बन जाते हैं और अंकों के आधार पर ही छात्रों की प्रतिभा को भी निर्धारित कर दिया जाता है।
हमें यहां यह समझना होगा कि परीक्षाएं हमारी शिक्षा व्यवस्था का एक अंग है, न कि शिक्षा का पर्यायवाची। परीक्षाओं का प्रयोग साधन के रूप में होना चाहिए न कि साध्य के रूप में। आधुनिक दौर में हम शिक्षा के वास्तविक अर्थ को भूलते जा रहे हैं और अधिक से अधिक अंक प्राप्त करने को ही आज का विद्यार्थी अपना उद्देश्य बना चुका है। ‘शिक्षा’ शब्द बहुत ही असाधारण है, क्योंकि यह अपने अंदर असीमित संभावनाएं समेटे हुए हैं और ये संभावनाएं व्यक्तिगत ही नहीं अपितु सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और अन्य पक्षों से संबंधित होती हैं, इसलिए चंद शब्दों में शिक्षा को समझा पाना कठिन है, पर आज के आधुनिक युग में भी यदि हमारी समझ, शिक्षा को मात्र अच्छे अंको का पर्यायवाची समझ बैठी है, तो निश्चित ही यह चिंता का विषय है।
शिक्षा को मात्र अच्छे अंक प्राप्त करने से जोड़ना न केवल शिक्षा के अर्थ को संकुचित करता है, अपितु यह शिक्षा से जुड़ी बहुत सी अवधारणाओं का निरादर करने जैसा है। आज अधिकतर छात्र और उनके अभिभावक अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। वे बच्चों की महंगी-महंगी ट्यूशंस लगाते हैं और बच्चे भी घंटो-घंटो तक अपना समय अध्ययन सामग्री को रटने में लगा देते हैं। बहुत बार अंक पाने की लालसा, न केवल विद्यार्थियों को, बल्कि उनके माता-पिता को भी अनुचित और गलत माध्यम अपनाने के लिए मजबूर कर देती है। यदि इस विचारधारा को सही समय पर बदला नहीं गया तो इसके दुष्परिणाम हो सकते हैं।
यहां यह भी समझना होगा कि इस स्थिति का एकमात्र कारण छात्र और उनके अभिभावक नहीं है अपितु हमारी परीक्षा प्रणाली भी है। परीक्षाएं हमारी शिक्षा व्यवस्था का अभिन्न अंग है और इनका उद्देश्य है बच्चों की समझ का आकलन करना। विभिन्न प्रकार की परीक्षा प्रणालियों में छात्रों के आकलन के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए जाते हैं, क्योंकि आंकलन केवल बौद्धिक स्तर का नहीं होना होता बल्कि भावात्मक और गतिपेशीय पक्ष का भी होना होता है। जिस प्रकार सीखना एक ‘सर्वांगीण विकास’ की प्रक्रिया है, उसी प्रकार आंकलन भी सभी पक्षों को लेकर होना चाहिए, यदि परीक्षा प्रणाली में पाठ्य-सहगामी क्रियाओं को भी प्रमुख बना दिया जाए, तो अधिक अंक प्राप्त करने की होड़ स्वता ही खत्म हो जाएगी। आंकलन को रचनात्मक बनाने की बहुत आवश्यकता है। परीक्षा प्रणाली मे उपयुक्त परिवर्तन लाकर हम विद्यार्थियों और अभिभावकों की सोच को बदल सकते हैं।
बच्चों को भी समझना है कि यदि वे विषय की समझ पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे तो अच्छे अंक सहज रूप से प्राप्त कर लेंगे, और सदैव एक बात का ध्यान रखें कि केवल अच्छे अंक प्राप्त करने से जीवन में सफलता निश्चित नहीं की जाती, इसके लिए अपने व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करें।